आज फिर मुझको क़िस्मत छलेगी प्रिये ॥

शुष्क वस्त्रों को गीला करेगी प्रिये ॥

भूल मैं जो गया आज छतरी कहीं ,

आज बरसात होकर रहेगी प्रिये ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति



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