दे चुका जीवन का मैं हर मूल्य हर भाटक ॥

जबकि मुझ पर खुल रहा अब मृत्यु का फाटक ॥

वस्त्र – आभूषण से रहता था लदा कल तक ,

आज गलियों में मैं घूमूँ बनके नग्नाटक ॥

( भाटक =किराया ,फाटक =द्वार ,नग्नाटक =सदा नंगा घूमने वाला साधु )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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