मुक्तक : 811 – दाँव पर लगाया है ॥

पैर नीचे की बस ज़मीं को पूरा का पूरा , सर की छत आस्माँ को दाँव पर लगाया है ॥ ज़िंदा रहने को लोग क्या नहीं किया करते ? हमने मरने को जाँ को दाँव पर लगाया है ॥ ठीक है ये...Read more

मुक्तक : 810 – किसकी है वह ?

मूर्ति मन मंदिर में मेरे माप की बैठी रही ॥ चाहता था जैसा मैं उस नाप की बैठी रही ॥ पूछते हो किसकी है वह ? और किसकी हो सके ? आप की बस आप की बस आप की बैठी रही ॥ -डॉ....Read more

मुक्तक : 809 – उकड़ूँ बैठकर ॥

बिन कोई बल खाये या रस्सी के जैसा ऐंठकर ॥ हाँ खड़े रहकर , पड़े रहकर या उकड़ूँ बैठकर ॥ है बड़ा तू तो रहे , मैं क्या करूँ ऐ पत्रकार ? सर्वथा मेरे निजी जीवन में मत घुसपैठकर ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 808 – धूल – मिट्टी की जगह

धूल – मिट्टी की जगह सीम या ज़र हो जाता ॥ तुच्छ झींगे से मगरमच्छ ज़बर हो जाता ॥ ख़ुद को महसूस हमेशा ही तो नाचीज़ किया , अपने कुछ होने का एहसास अगर हो जाता ॥ ( सीम या ज़र...Read more

मुक्तक : 806 – लिबास

हमने ज्यों ही लिबास पहना था शराफ़त का , दुनिया बदमाशियों पे हो गई उतारू सब ॥ हमने ज्यों ही उतारा मैक़शी के दामन को , लोग पीने लगे बग़ैर प्यास दारू सब ॥ उनको कहते हैं लोग शहर का बड़ा नेता –...Read more