नर्म चिकनाई को पैरों , से कुचलते थे कभी जो ,

खुरदुरे पत्थर पे अपने , आज रो-रो गाल घिसते ।।

तोड़ते थे , फोड़ते थे , जो हथौड़े से सभी को ,

वक़्त की वो चक्कियों में , मिर्च से चुपचाप पिसते ।।

जो ठुमकती चलतीं कलकल , बहतीं नदियाँ रोककर कल ,

पर्वतों से बाँधते थे , बाँध ताली ठोककर कल ;

वो ही गहरी खाइयों में , आज ग़म की गिर पड़े तो ,

उनकी आँखों से मुसल्सल , ख़ून के आँसू हैं रिसते ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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