मुक्तक : 819 – कोयल की कूक

कोयल की कूक कपि की , किट-किट भी मुझमें है ॥ मुझमें धड़ाम भी तो , चिट-चिट भी मुझमें है ॥ किरदार से सुनो हूँ , शफ़्फाक हंस मैं , हालात के मुताबिक़ , गिरगिट भी मुझमें है ॥ ( किरदार...Read more

183 : ग़ज़ल – इश्क़ में सच हो फ़ना

इश्क़ में सच हो फ़ना हम शाद रहते हैं ॥ लोग तो यों ही हमें बरबाद कहते हैं ॥ आँसुओं का क्या है जब मर्ज़ी हो आँखों से , हो ख़ुशी तो भी लुढ़क गालों पे बहते हैं ॥ मार...Read more

182 : ग़ज़ल – चोली – घाघरा

आज ख़ालीपन मेरा पूरा भरा है ॥ अब कहीं पीला नहीं है बस हरा है ॥ जिसपे मैं क़ुर्बान था आग़ाज़ से ही , वह भी आख़िरकार मुझ पर आ मरा है ॥ उसने मुझको तज के ग़ैर अपना लिया...Read more

कविता : मैं हूँ विरह

मैं हूँ विरह मधुमास नहीं ॥ तड़पन हूँ नट , रास नहीं ॥ मुझको दुःख में पीर उठे , हँसने का अभ्यास नहीं ॥ उनके बिन जीना _मरना , क्यों उनको आभास नहीं ? उनका हर आदेश सुनूँ , पर मैं उनका दास नहीं ॥ दिखने में...Read more

181 : ग़ज़ल – ज़हर ला पिलवा

एक तूने क्या दिया धोख़ा मुझे ? दोस्त सब लगने लगे ख़तरा मुझे ॥ मैंने दी सौग़ात में बंदूक तुझको , तूने गोली से दिया उड़वा मुझे ॥ मैं बढ़ाता ही रहा शुह्रत तेरी , और तू करता रहा रुस्वा...Read more

मुक्तक : 818 – मुझपे करना ज़ुल्म

मुझपे करना ज़ुल्म सारे , रात-दिन करना जफ़ा ॥ खुश न रहना मुझसे चाहे रहना तुम हरदम ख़फ़ा ॥ गालियाँ भी जितना जी चाहे मुझे बकना मगर , इक गुज़ारिश है कभी कहना मुझे मत बेवफ़ा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more