■ मुक्तक : 812 – कब मिटाती हैं मुझे ?

ग़मज़दा हरगिज़ नहीं ये मुझको करतीं शाद हैं ॥ कब मिटातींं हैं मुझे ? करतीं ये बस आबाद हैं ॥ कौन कहता है कि मेरा रहनुमा कोई नहीं ? मुझको मेरी ठोकरें सबसे बड़ी उस्ताद हैं ॥ ( शाद =प्रसन्न ,रहनुमा =पथप्रदर्शक ,उस्ताद...Read more