क्यों मैं सोचूँ दौर मेरा थम गया है ?

खौलता लोहू रगों में जम गया है ॥

खिलखिलाते उठ रहे हैं सब वहाँ से ,

जो भी आया वो यहाँ से नम गया है ॥

इक शराबी से ही जाना राज़ था ये ,

मैक़शी से कब किसी का ग़म गया है ?

चोरियाँ चुपचाप ही करते हैं सब ही ,

दिल चुराकर वो मेरा छम-छम गया है ॥

इसमें क्या हैरानगी की बात जो ,

शह्र में जाकर गँवार इक रम गया है ?

उसका जीने की तमन्ना में ही सचमुच ,

जितना भी बाक़ी बचा था दम गया है ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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