■ मुक्तक : 813 – गुसल करते हैं ॥

ख़ूब आहिस्ता चुपके-चुपके सँभल करते हैं ॥ अपनी मर्ज़ी से अपनी ज़ीस्त अजल करते हैं ॥ एक बोतल शराब हम तो कभी पी झूमें , वो तो इंसाँ के खूँ से रोज़ गुसल करते हैं ॥ ( आहिस्ता =धीरे , ज़ीस्त...Read more