■ मुक्तक : 816 – जीर्ण-शीर्ण है

भग्न है जीर्ण – शीर्ण है निपट निरालय है ॥ मन मेरा क्या है एक दुःख का संग्रहालय है ॥ कष्ट की खाई का कहीं पे इसमें है डेरा , इसमें पीड़ा का बस रहा कहीं हिमालय है ॥ -डॉ. हीरालाल...Read more