भग्न है जीर्ण – शीर्ण है निपट निरालय है ॥

मन मेरा क्या है एक दुःख का संग्रहालय है ॥

कष्ट की खाई का कहीं पे इसमें है डेरा ,

इसमें पीड़ा का बस रहा कहीं हिमालय है ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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