आज ख़ालीपन मेरा पूरा भरा है ॥

अब कहीं पीला नहीं है बस हरा है ॥

जिसपे मैं क़ुर्बान था आग़ाज़ से ही ,

वह भी आख़िरकार मुझ पर आ मरा है ॥

उसने मुझको तज के ग़ैर अपना लिया जब ,

मैंने भी अपना लिया तब दूसरा है ॥

कुछ न पाया मैंने की हासिल मोहब्बत ,

ज़िंदगी में इससे बढ़कर क्या धरा है ?

बन न पाया मैं सहारा उसका लेकिन ,

अब भी वो संबल है मेरा आसरा है ॥

आदमी जाँ को बचाने कुछ भी खा ले ,

शेर ने कब भूख में तृण को चरा है ?

भूल है मर्दों से कम उसको समझना ,

उसने बेशक़ पहना चोली – घाघरा है ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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