इश्क़ में सच हो फ़ना हम शाद रहते हैं ॥

लोग तो यों ही हमें बरबाद कहते हैं ॥

आँसुओं का क्या है जब मर्ज़ी हो आँखों से ,

हो ख़ुशी तो भी लुढ़क गालों पे बहते हैं ॥

मार से कब टूटते इंसाँ हथौड़ों की ,

वो तो अपने प्यार की ठोकर से ढहते हैं ॥

जो हों ज़ख़्मी फूल से भी , वो भी पत्थर की ,

सख़्त मज्बूरी में हँस-हँस चोट सहते हैं ॥

सूर्य से भी हम कभी पाते थे ठंडक अब ,

हिज़्र में तेरे सनम चंदा से दहते हैं ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *