ग़ज़ल : 186 – कच्ची-पक्की शराब की बातें ॥

पैर लटके हैं क़ब्र में फिर भी , बस ज़ुबाँ पे शबाब की बातें ।। लोग हँसते हैं सुनके सब ही तो , शेख़चिल्ली-जनाब की बातें ।। दाँत मुँह में नहीं रहे उनके , औ’ न आँतें हैं पेट में...Read more

मुक्तक : 826 – जोड़-तोड़ कर

जोड़-घटाकर जैसे-तैसे इक घर बनवाया ॥ पर कुदरत को मेरा यह निर्माण नहीं भाया ॥ रात अचानक जब इसमें सब सोए थे सुख से , छोड़ मुझे कुछ भी न बचा ऐसा भूकंप आया ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 825 – जब चाहे तू छुड़ाले ॥

भूखा है तो चबाकर , जी भर के मुझको खाले ॥ प्यास अपनी क़तरा-क़तरा , खूँ चूसकर बुझाले ॥ मालिक है तू मेरा हर , इक हक़ है मुझपे तेरा , जो चाहिए मेरा सब , जब चाहे तू छुड़ाले...Read more

मुक्तक : 824 – चूमेगी कह-कह बालम ॥

हँसके जीने भी नहीं देते जो लोग आज मुझे , मेरे मरने पे मनाएँगे ग़ज़ब का मातम ।। आज लगती है मेरी चाल उन्हें बेढब सी , कल मेरे तौर-तरीक़ों पे चलेगा आलम ।। वक़्त बेशक़ जो मुझे आज दुलत्ती मारे , बात...Read more

मुक्तक : 823 – सौभाग्य–लेखन

चाहता था मेरे हाथों में तेरा मन-हाथ होता ॥ स्वर्ग से ले नर्क तक तू मेरे हर छन साथ होता ॥ मिल के सारे काट लेते रास्ते काँटों भरे हम , किन्तु कब सबके लिए सौभाग्य-लेखन माथ होता ? -डॉ. हीरालाल...Read more

मुक्तक : 822 – कागज से भी पतली

कागज से भी पतली या फिर ग्रंथों से भी मोटी से ॥ सागर से भी ज्यादा विस्तृत या बूँदोंं से छोटी से ॥ ताजा-ताजा अंगारे सी या हिम सी ठण्डी बासी , मिलवा दो प्राचीन क्षुधा को सद्यावश्यक रोटी से ॥...Read more