मुक्तक : 820 – गुलों की शक्ल

गुलों की शक्ल में दरअस्ल यह बस ख़ार होती है ॥ लगा करती है दरवाज़ा मगर दीवार होती है ॥ हक़ीक़त में ही हम यारों न पैदा ही हुए होते , अगर यह जान जाते ज़िंदगी दुश्वार होती है ॥  (...Read more