गुलों की शक्ल में दरअस्ल यह बस ख़ार होती है ॥

लगा करती है दरवाज़ा मगर दीवार होती है ॥

हक़ीक़त में ही हम यारों न पैदा ही हुए होते ,

अगर यह जान जाते ज़िंदगी दुश्वार होती है ॥

 ( गुल = पुष्प , ख़ार = काँटा )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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