मुक्तक : 821 – अर्क-ए-गुलाब

पानी तलब करो मैं ला दूँ अर्क-ए-गुलाब ॥ गर तुम कहो तो इक सफ़्हा क्या लिख दूँ मैं किताब ॥ हसरत है तुम जो माँँगो दूँ वो उससे बढ़के तुमको ,बदले में दो जो अपना सच्चा प्यार बेहिसाब ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more