मुक्तक : 822 – कागज से भी पतली

कागज से भी पतली या फिर ग्रंथों से भी मोटी से ॥ सागर से भी ज्यादा विस्तृत या बूँदोंं से छोटी से ॥ ताजा-ताजा अंगारे सी या हिम सी ठण्डी बासी , मिलवा दो प्राचीन क्षुधा को सद्यावश्यक रोटी से ॥...Read more