कागज से भी पतली या फिर ग्रंथों से भी मोटी से ॥

सागर से भी ज्यादा विस्तृत या बूँदोंं से छोटी से ॥

ताजा-ताजा अंगारे सी या हिम सी ठण्डी बासी ,

मिलवा दो प्राचीन क्षुधा को सद्यावश्यक रोटी से ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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