मुक्तक : 826 – जोड़-तोड़ कर

जोड़-घटाकर जैसे-तैसे इक घर बनवाया ॥ पर कुदरत को मेरा यह निर्माण नहीं भाया ॥ रात अचानक जब इसमें सब सोए थे सुख से , छोड़ मुझे कुछ भी न बचा ऐसा भूकंप आया ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 825 – जब चाहे तू छुड़ाले ॥

भूखा है तो चबाकर , जी भर के मुझको खाले ॥ प्यास अपनी क़तरा-क़तरा , खूँ चूसकर बुझाले ॥ मालिक है तू मेरा हर , इक हक़ है मुझपे तेरा , जो चाहिए मेरा सब , जब चाहे तू छुड़ाले...Read more