जोड़-घटाकर जैसे-तैसे इक घर बनवाया ।।

पर क़ुद्रत को मेरा वह निर्माण नहीं भाया ।।

रात अचानक जब उसमें सब सोए थे सुख से ,

छोड़ मुझे कुछ भी न बचा ऐसा भूकंप आया ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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