पैर लटके हैं क़ब्र में फिर भी , बस ज़ुबाँ पे शबाब की बातें ।।

लोग हँसते हैं सुनके सब ही तो , शेख़चिल्ली-जनाब की बातें ।।

दाँत मुँह में नहीं रहे उनके , औ’ न आँतें हैं पेट में बाक़ी ,

करते रहते हैं फिर भी जब देखो , तब ही मुर्ग़-ओ-क़बाब की बातें

भैंस के ही समान लगते हैं , उनको घनघोर काले अक्षर भी ,

मुँह से उनके मगर हमेशा ही , आप सुनना किताब की बातें ।।

आप मानेंगे कब मेरी लेकिन , मैंने नासेह के सुनी मुँह से ,

अपने कानों से ख़ुद के कल सचमुच , कच्ची-पक्की शराब की बातें ।।

साँस लेने में भी है उनको सच , हाय तक्लीफ़ दाढ़ दुखने सी ,

और करते हैं सूँघने की वो , सिर्फ इत्रे-गुलाब की बातें ।।

उनके सर के न टोप की बातें , ना गले के हसीं दुपट्टे की ,

जब भी करते हैं वो तो पाँवों के , उनके जूते-जुराब की बातें ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *