185 : ग़ज़ल – खलबली

बात अच्छी भी आज उसकी क्यों खली हमको ? जिसकी बकबक भी कल तलक लगी भली हमको ॥ क्या हुआ आज कह रहा हमें वही काँटा , जो चुभन में भी बोलता था गुल-कली हमको ? आज कहता है क्यों...Read more

मुक्तक : 821 – अर्क-ए-गुलाब

पानी तलब करो मैं ला दूँ अर्क-ए-गुलाब ॥ गर तुम कहो तो इक सफ़्हा क्या लिख दूँ मैं किताब ॥ हसरत है तुम जो माँँगो दूँ वो उससे बढ़के तुमको ,बदले में दो जो अपना सच्चा प्यार बेहिसाब ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

गीत : 42 – क्या किसी भूले हुए

क्या किसी भूले हुए ग़म की याद आने लगी ? हँसते – हँसते हुए क्यूँ आँख छलछलाने लगी ? क्या किसी भूले हुए…………………….. आँख कस – कस के भी लगाए लग न पाती है । रात करवट बदल – बदल के बीत...Read more

184 : ग़ज़ल – मैं फ़िदा था

कैसी भी हो ताती-बासी-पतली-मोटी ॥ भूख में आँखों में नचती सिर्फ़ रोटी ॥ कान काटे है बड़े से भी बड़ों के , उम्रो क़द में छोटे छोटों से वो छोटी ॥ मैं फ़िदा था जिसपे वो जाने क्यों उसने ,...Read more

मुक्तक : 820 – गुलों की शक्ल

गुलों की शक्ल में दरअस्ल यह बस ख़ार होती है ॥ लगा करती है दरवाज़ा मगर दीवार होती है ॥ हक़ीक़त में ही हम यारों न पैदा ही हुए होते , अगर यह जान जाते ज़िंदगी दुश्वार होती है ॥  (...Read more