मुक्तक : 843 – मेरे खिलते ही

मेरे खिलते ही पूरा मुझको भी तोड़ा जाता ॥ यूँ ही गुलशन में मुझ कली को न छोड़ा जाता ॥ ख़ूबसूरत भी तो नहीं न मुअत्तर हूँ मैं , वर्ना मुझको भी इत्र को न निचोड़ा जाता ? -डॉ. हीरालाल...Read more

मुक्तक : 842 – लेना सबक ज़रूर

भूले फटकता था न कभी पास जो मेरे , क्यों वक़्त वो निकाल के अब रोज़ ही आता ? ऐसा नहीं कि उसको मैं अच्छा सा लगे हूँ , ये भी नहीं कि उसको मेरा रोब लुभाता !! हैरत न खाना वज़्ह...Read more

ग़ज़ल : 188 ( B) ) : अल्लाह है ना राम

मीर है ना मिर्ज़ा ग़ालिब नाम मेरा है ॥ हाँ ग़ज़ल हर रोज़ कहना काम मेरा है ॥ मैंने कब सीता चुराई फिर भी रावण सा , किसलिए होता बुरा अंजाम मेरा है ? उनके लब पे प्यास का यों...Read more

■ मुक्तक : 841 – तलाशना हमें बहारों में ॥

मत खुले में तलाशना हमें बहारों में ॥ ढूँढना पत्थरों के ऊँचे कारागारों में ॥ सिर्फ़ इक भूल का अंजाम भोगने को खड़े , हम ख़तरनाक गुनहगारों की कतारों में ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 840 – वो सीधा-सादा सा

वो सीधा-सादा सा टेढ़ी निगाह कर बैठा ॥ शरीफ़ हो के भी ज़ुर्म-ओ-गुनाह कर बैठा ॥ कि अधबने को बनाते बनाते जाने क्यों , न करके पूरा वो पूरा तबाह कर बैठा ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 839 – पाँव की जूती

कल की चीज़ों की अभी की आज की रक्खी ॥ पाँव की जूती की सिर के ताज की रक्खी ॥ कौन सा बाज़ार है ये जिसमे तितली की , बेचने वालों ने क़ीमत बाज़ की रक्खी ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more