■ मुक्तक : 829 – मान जाना रे

मान जाना रे किसी दिन न भी मनाने पर ॥ ख़ुद चले आना रे मेरे न भी बुलाने पर ॥ कम से कम तब तो मेरी बात मान जाना रे , जब पहुँच जाऊँ रे मैं क़ब्र के मुहाने पर ॥...Read more