छूना है शाम को या पकड़ना है सहर को ;

हमको नहीं पता था कि जाना है किधर को ?

जब तक थे पाँँव चलते रहे , चलते रहे हम ,

कटने के बाद भी था रखा जारी सफ़र को ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *