कृष्ण के सब मूक हो वाचाल होते कंस के ॥

उठ रहे हैं धीरे-धीरे तुममें स्वर विध्वंस के ॥

हो गया ऐसा तुम्हारे साथ में क्या दुर्घटित ,

रँग रहे हो काग रँग सब छोड़कर ढंग हंस के ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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