■ मुक्तक : 835 – जीवन

खट्टे-मीठे के सँग तीखापन-कड़वाहट भी होती ॥ चुप-चुप सन्नाटों के सँग में फुस-फुस आहट भी होती ॥ जीवन में क्या-क्या है शामिल ; गिनवाना बालों जैसा ? बेफ़िक्री भी इसमें कुछ-कुछ , कुछ घबराहट भी होती ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

* गीत : 44 – जी भर गया है ॥

कि चाहो तो क्या तुम न चाहो तो क्या है ? मोहब्बत से अब अपना जी भर गया है ।। न धोखाधड़ी की न जुल्म-ओ-जफ़ा की । जो करता हो बातें हमेशा वफ़ा की । मगर तज़्रिबा अपना ज़ाती ये कहता , वही...Read more