कि चाहो तो क्या तुम न चाहो तो क्या है ?

मोहब्बत से अब अपना जी भर गया है ॥

न धोखाधड़ी की न जुल्म-ओ-जफ़ा की ।

जो करता हो बातें हमेशा वफ़ा की ।

मगर तज़्रिबा अपना ज़ाती ये कहता ,

वही हमसे अक़्सर ही करता दग़ा है ॥

कि चाहो तो क्या तुम न चाहो तो क्या है ?

मोहब्बत से अब अपना जी भर गया है ॥

वो ग़ैरों को क्या अपनों तक को भी खलती ।

मैं करता हूँ जब देखो तब बात जलती ।

उगलती ज़ुबाँ बर्फ़ भी आग जैसा ,

क़सम से मेरा इस क़दर दिल जला है ॥

कि चाहो तो क्या तुम न चाहो तो क्या है ?

मोहब्बत से अब अपना जी भर गया है ॥

हुई साथ में जिसके ख़ालिस बुराई ।

ज़माने ने बस जिसको ठोकर लगाई ।

कई मर्तबा जो गिराया गया हो ,

वही आस्माँ से भी ऊँचा उठा है ॥

कि चाहो तो क्या तुम न चाहो तो क्या है ?

मोहब्बत से अब अपना जी भर गया है ॥

( तज़्रिबा = अनुभव , ज़ाती = निजी , ख़ालिस = विशुद्ध )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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