■ मुक्तक : 837 – भूखा भेड़िया

गाय को भूखा भेड़िया या शेर होने पे ॥ आबे ज़मज़म में हलाहिल खुला डुबोने पे ॥ आह को लेके क्या मेरी तबाह होना है ? रूह आमादा मेरी मत करो या ! रोने पे ॥ ( आबे ज़मज़म = अमृत...Read more

■ मुक्तक : 836 – पानी पर से हाथी

जैसे पानी पर से हाथी चल निकल आया ॥ काले पत्थर में से मीठा जल निकल आया ॥ रात-दिन मैं ढूँढता था जिसको मर-मर कर , मेरी मुश्किल का कुछ ऐसे हल निकल आया ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more