ग़ज़ल : 187 – इम्तिहाँ

जीवन बिताने पूछ मत कि हम कहाँ चले ? हर ओर मृत्यु नृत्यरत है हम वहाँ चले ॥ तैयारियाँ तो अपनी कुछ नहीं हैं किन्तु हम , देने कमर को कसके सख़्त इम्तिहाँ चले ॥ अगुवा बना लिया है अब...Read more