जीवन बिताने पूछ मत कि हम कहाँ चले ?

हर ओर मृत्यु नृत्यरत है हम वहाँ चले ॥

तैयारियाँ तो अपनी कुछ नहीं हैं किन्तु हम ,

देने कमर को कसके सख़्त इम्तिहाँ चले ॥

अगुवा बना लिया है अब तो भाग्य को ही सच ,

जाएँगे उसके पीछे लेके वो जहाँ चले ॥

उनके वहाँ तो पत्ता भी हिले नहीं कभी ,

आँधी नहार हो कि शब सदा यहाँ चले ॥

आदत है उसकी वक़्त पे न आए वो कभी ,

तिसपे है शौक़ सर उठा वो नागहाँ चले ॥

( सख़्त इम्तिहाँ = कठिन परीक्षा ,नहार = दिन ,नागहाँ = कुसमय ,अचानक )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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