हमने देखा फ़ायदा कुछ भी नहीं तदबीर का ॥

कामयाबी में हमेशा हाथ हो तक़दीर का ॥

बेर जब हमको ज़रूरी हमको मत अंगूर दो ,

जिस जगह अमरूद लाज़िम काम क्या अंजीर का ?

बाँधने उसको चले तुम रेशमी धागा लिए ,

जिसके आगे टूटता दम रस्से का , ज़ंजीर का ॥

नौजवाँ इक रोज़ बूढ़ा तू भी होगा शर्तिया ,

मत मज़ा ले राह चलते कँपकँपाते पीर का ॥

जंगजू की नौकरी करता है वो सरकार की ,

और लगता है उसे डर तीर का , शमशीर का ॥

सब ग़ज़ल कहते रहें ताउम्र लेकिन सच है ये ,

पा न पाएंगे कभी रुतबा वो ग़ालिब – मीर का ॥

( तदबीर = प्रयास , लाज़िम = आवश्यक , पीर = वृद्ध , जंगजू = सैनिक , शमशीर = तलवार )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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