■ मुक्तक : 838 – कबरी बिल्ली हो गए ॥

हम जबलपुर से यकायक सीधे दिल्ली हो गए ।। एक चूहे से बिफरती कबरी बिल्ली हो गए ।। मुल्ला नसरुद्दीन थे लेकिन हुआ फ़ुर्सत में यों , मन के लड्डू खाते-खाते शेख़चिल्ली हो गए ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more