■ मुक्तक : 839 – पाँव की जूती

कल की चीज़ों की अभी की आज की रक्खी ।। पाँव की जूती की सिर के ताज की रक्खी ।। कौन सा बाज़ार है ये जिसमे तितली की , बेचने वालों ने क़ीमत बाज़ की रक्खी ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more