मीर है ना मिर्ज़ा ग़ालिब नाम मेरा है ॥

हाँ ग़ज़ल हर रोज़ कहना काम मेरा है ॥

मैंने कब सीता चुराई फिर भी रावण सा ,

किसलिए होता बुरा अंजाम मेरा है ?

उनके लब पे प्यास का यों ज़िक्र आया था ,

दे दिया मैंने उठाकर जाम मेरा है ॥

झूठ के दम पर तो मैं आज़ाद फिरता था ,

क़ैद तो सच कहने का इन्आम मेरा है ॥

मैं तो बस इंसानियत को मानता हूँ रब ,

ना मेरा अल्लाह है ना राम मेरा है ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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