■ मुक्तक : 842 – लेना सबक ज़रूर

भूले फटकता था न कभी पास जो मेरे , क्यों वक़्त वो निकाल के अब रोज़ ही आता ? ऐसा नहीं कि उसको मैं अच्छा सा लगे हूँ , ये भी नहीं कि उसको मेरा रोब लुभाता !! हैरत न खाना वज़्ह...Read more