भूले फटकता था न कभी पास जो मेरे ,

क्यों वक़्त वो निकाल के अब रोज़ ही आता ?

ऐसा नहीं कि उसको मैं अच्छा सा लगे हूँ ,

ये भी नहीं कि उसको मेरा रोब लुभाता !!

हैरत न खाना वज़्ह को आप इसकी समझकर ,

लेना सबक ज़रूर मगर सच ही समझकर ,

जाना है जबसे उसने कि मैं मोम हूँ तो बस ,

कुछ धूप , थोड़ी आँच वो रख साथ में लाता ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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