● ग़ज़ल : 200 – बना-बना के बिगाड़ा

लगा के बाग़ उजाड़ा , ये बात ठीक न की ॥ बना बना के बिगाड़ा , ये बात ठीक न की ॥ जगाने मुझको तू आया तो बाँग देता मगर , तू कान में ही दहाड़ा , ये बात ठीक...Read more

ग़ज़ल : 199 – अपना सा बनाने वाले ॥

मुस्कुराहट को ठहाका सा बनाने वाले ॥ दरिया भर दर्द वो क़तरा सा बनाने वाले ॥ एक हम हैं जो रखें गुड़ भी बनाके गोबर , और लोहे को वो सोना सा बनाने वाले ॥ हमने बाग़ों से कली-फूल जो...Read more

ग़ज़ल : 198 – तबले की तिरकिट-धा-धिन है ॥

चाँदी रात है , सोना दिन है ॥ दिल अपना नाख़ुश लेकिन है ॥ तेरे बिन जीना नामुमकिन , फिर भी जीना तेरे बिन है ॥ उससे क्या माँगें जो दाने , ना तोले देता गिन-गिन है ॥ कैसे चूमें-चाटें...Read more

ग़ज़ल : 197 – अच्छा नहीं किया हमने ॥

हाँ ; दवा-दारू , न ज़हराब ही पिया हमने ॥ ज़ख्म बढ़ता ही रहा फिर भी नाँ सिया हमने ॥ इतने तो भूखे रहे हम कि जब मिला पानी , हमने रोटी सा चबाया नहीं पिया हमने ॥ उसने वो...Read more

ग़ज़ल : 196 – पछाड़ बन बैठे ॥

तेरी चाहत में यार तिल से ताड़ बन बैठे ।। सच में तुलसी से एक वट का झाड़ बन बैठे ।।1।। ईंट-पत्थर की थी दिवार ऊँची-मोटी बस , तेरे आने से खिड़की औ’ किवाड़ बन बैठे ।।2।। चिड़चिड़ाहट के बुत...Read more

ग़ज़ल : 195 – छोड़ दो अब अतीत की बातें ॥

शत्रु हो बैठे मीत की बातें ॥ छोड़ दो अब अतीत की बातें ॥ दुःख भरे राग छेड़ना छोड़ो , बस करो हर्ष-गीत की बातें ॥ हार को भूलभालकर पिछली , सोचो अब अगली जीत की बातें ॥ बैरियों से...Read more