मेह्रबानी करके ये एहसान कर ॥

मेरे मुर्दे में न तू फिर जान भर ॥

ज़िंदगी भर को चले जाना तू फिर ,

पास मेरे बैठ करके आन भर ॥

जबकि रिश्ता उससे था खूँ का मगर ,

ऐसा लगता था कि थी पहचान भर ॥

आस्तीं का साँप है या दोस्त तू ,

मत मेरे बारे में उसके कान भर ?

कबसे आँखें खोलकर लेटा हूँ रे ,

नींद आ जाए तू ऐसी तान भर ॥

शे’र मत कह , कह ग़ज़ल मेरे लिए ,

एक-दो मत , अनगिनत दीवान भर ॥

ख़ूब इतराते थे चख तर माल कल ,

खा रहे हैं आज सूखी नान भर ॥

इस क़दर काटे गए उससे शजर ,

रह गया जंगल वो अब मैदान भर ॥

उनके दिलबर उनकी औलादों के अब ,

रह गए हैं बनके अब्बाजान भर ॥

रह गए बनकर बहादुरशा ज़फ़र ,

नाम के राजा हैं झूठी शान भर ॥

( मेह्रबानी करके = कृपया , आन = क्षण , दीवान = विशिष्ट ग़ज़ल संग्रह , नान = रोटी , शजर = पेड़ , दिलबर = प्रेमपात्र )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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