गीत एकल गा रहे समवेत हम ॥

कर रहे लंका को भी साकेत हम ॥

देखकर आकार कोई ना डरे ,

इसलिए पर्वत को कहते रेत हम ॥

दुख न हो महिषी को बस ये सोचकर ,

उसकी श्यामलता को बोलें श्वेत हम ॥

क्यों न रूठे हाय वर्षा ऋतु अरे ,

कर रहे वन दिन पे दिन सब खेत हम ?

जल नहीं तो कुछ नहीं इस बात को ,

क्यों नहीं अब भी रहे हैं चेत हम ?

निशि-दिवस चिंता चिता के तुल्य है ,

मृत्यु का समझें न ये संकेत हम ॥

मुक्ति निस्सन्देह हो अभिप्रेत पर ,

जीते जी सब हो रहे क्यों प्रेत हम ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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