फूलों सा मैं यकायक नश्तर सा हो गया ।।

थपकी से एक थप्पड़-ठोकर सा हो गया ।।

माना मैं मोम था कल , मक्खन सा नर्म था ,

कुछ हो गया कि अब मैं पत्थर सा हो गया ।।

‘शोले’ का सच में था मैं ‘ठाकुर’ सा क्या कहूँ ?

‘शोले’ का आजकल मैं ‘गब्बर’ सा हो गया ।।

पहले नहीं थी उसकी आँखों में भी जगह ,

अब दिल-दिमाग़ में भी इक घर सा हो गया ।।

वो मुझसे यों कटे बस लगता है मुझको ये ,

जैसे कोई परिंदा बेपर सा हो गया ।।

रगड़ा गया है मुझको इतना कि खुरदुरे ,

इक रेगमाल से मैं मर्मर सा हो गया ।।

भूकंप इतने झेले मेरे मकान ने ,

है तो नया ही लेकिन जर्जर सा हो गया ।।

पहले नहीं थी इसमें मूरत कोई मगर ,

मस्जिद सा मेरा दिल अब मंदिर सा हो गया ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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