शत्रु हो बैठे मीत की बातें ॥

छोड़ दो अब अतीत की बातें ॥

दुःख भरे राग छेड़ना छोड़ो ,

बस करो हर्ष-गीत की बातें ॥

हार को भूलभालकर पिछली ,

सोचो अब अगली जीत की बातें ॥

बैरियों से रखो तुम अनबोला ,

अपनों से कीजै प्रीत की बातें ॥

जो नहीं लाभप्रद न अच्छी ही ,

मत निभाओ वो रीत की बातें ॥

कँपकँपातों को आँच-धूप वरो ,

मत करो बर्फ-शीत की बातें ॥

नित्य मल-भक्षकों से मत करना ,

गंगा-जमुना पुनीत की बातें ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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