तेरी चाहत में यार तिल से ताड़ बन बैठे ।।

सच में तुलसी से एक वट का झाड़ बन बैठे ।।1।।

ईंट-पत्थर की थी दिवार ऊँची-मोटी बस ,

तेरे आने से खिड़की औ’ किवाड़ बन बैठे ।।2।।

चिड़चिड़ाहट के बुत थे और ग़ुस्सेवर थे हम ,

तूने चाहा तो धीरे-धीरे लाड़ बन बैठे ।।3।।

तुझको छुप-छुप दरार में से झाँकने वाले ,

आज तेरा ही पर्दा , ओट , आड़ बन बैठे ।।3।।

ख़ुद की जीते जी जो जुगत न बन सके तेरी ,

तेरे मक़्सद पे जान दे जुगाड़ बन बैठे ।।4।।

बस मोहब्बत की कुश्तियों में सब रक़ीबों को ,

करके छोड़े जो चित ही वो पछाड़ बन बैठे ।।5।।

दुश्मनों को तेरे जलाने – भूनने को हम ,

गाह तंदूर गाह एक भाड़ बन बैठे ।।6।।

( बुत = प्रतिमा , ग़ुस्सेवर = क्रोधी , रक़ीबों = अपनी प्रेमिका के प्रेमी , गाह = कभी , भाड़ = अनाज भूनने की भट्टी )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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