मुस्कुराहट को ठहाका सा बनाने वाले ॥

दरिया भर दर्द वो क़तरा सा बनाने वाले ॥

एक हम हैं जो रखें गुड़ भी बनाके गोबर ,

और लोहे को वो सोना सा बनाने वाले ॥

हमने बाग़ों से कली-फूल जो तोड़े-फेंके ,

उनको चुन-चुन के वो गजरा सा बनाने वाले ॥

सिर्फ़ रोतों को हँसाने के बड़े मक़्सद से ,

ग़म का क़िस्सा वो लतीफ़ा सा बनाने वाले ॥

हमसे अपने भी गए तोड़ के रिश्ता-नाता ,

दुश्मनों को भी वो अपना सा बनाने वाले ॥

हमने बचपन को सरेआम बनाया बूढ़ा ,

वो बड़े-बूढ़ों को बच्चा सा बनाने वाले ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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