ग़ज़ल : 206 – लाशों से शर्मिंदा हूँ ॥

लाशों से शर्मिंदा हूँ ॥ मुर्दों सा जो ज़िंदा हूँ ॥ पर औ’ पाँव कटे तो क्या , ज़ात का एक परिंदा हूँ ॥ बेघर हूँ तो क्या उनके , दिल का तो बाशिंदा हूँ ॥ अँधियारा भागे मुझसे ,...Read more

ग़ज़ल : 205 – दिल लगाने चल पड़ा हूँ मैं ॥

हथेली पर ही सरसों को जमाने चल पड़ा हूँ मैं ॥ कि बिन पिघलाए पत्थर को बहाने चल पड़ा हूँ मैं ॥ नहीं हैं आँखें जिसकी और न जिसके कान भी उसको , गले को फाड़कर अपने बुलाने चल पड़ा...Read more

*मुक्त-ग़ज़ल : 204 – छटपटाकर रह गया हूँ ॥

मात बच्चों से ही खाकर रह गया हूँ ॥ तिलमिलाकर , छटपटाकर रह गया हूँ ॥ आर्ज़ू तो थी कि सोना ही उठाऊँ , हाथ मिट्टी ही उठाकर रह गया हूँ ॥ मो’तबर कोई नहीं जब मिल सका तो ,...Read more

ग़ज़ल : 203 – रावण भी रहता है मुझमें !!

तू क्या जाने क्या है मुझमें ? सिंह है या चूहा है मुझमें !! इत बसते हैं सीतापति उत , रावण भी रहता है मुझमें !! बूढ़ा हूँ पर सच नटखट सा , अब भी इक बच्चा है मुझमें !!...Read more

मत हँसें !

[ चित्र Google Search से साभार ]  चाहकर भी हो न पाते छरहरे , हम पे क़ुदरत का है ये ज़ुल्मो-सितम ॥ हम पे हँसने की जगह करना दुआ , कैसे भी हो ? हो हमारा वज़्न कम ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 852 – दया , करुणा , अहिंसा

हाँ दया , करुणा , अहिंसा का सतत उपदेश दे ॥ किन्तु मत प्रकृति विरोधी रात – दिन संदेश दे ॥ वृद्ध हो , भूखा हो तेरा दास भी हो तो भी मत , घास चरने का कभी भी शेर को आदेश दे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more