लगा के वो मेरी खुशियों में आग हँसते हैं ॥

गिरा के खाई में छुप–छुप के भाग हँसते हैं ॥

पिला के ज़ह्र मुझको मौत की सुला के नींद ,

शराब पी के सारी रात जाग हँसते हैं ॥

ख़मोश रहके भी डसते हैं और बोलें तो ,

जुबाँ के उनकी काले , काट , नाग हँसते हैं ॥

मलार सुनने मेरे कान जब मचलते हैं ,

सुना के मुझको तब वो दीप राग हँसते हैं ॥

बुला के शेर को दावत पे तश्तरी भर-भर ,

परोस घास-भूसा-पात-साग हँसते हैं ॥

हैं इस क़दर वो दीवाने नुकीले काँटों के ,

उजाड़-उजाड़ के फूलों के बाग़ हँसते हैं ॥

फ़रिश्ते होते हैं गिरतों को थामने वाले ,

गिरा-गिरा के तो बस लोग-बाग हँसते हैं ॥

( मलार = वर्षा ऋतु के समय गाया जाने वाला राग , मल्हार )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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