वक़्त-ए-आख़िर सही रे एक बार ही मुझको ,

अपने सीने से तू लगा के माफ़ कर देना ।।

मेरी ख़ातिर जो तेरे दिल में मैल है तारी ,

कर के मुझको हलाल ख़ूँ से साफ़ कर देना ।।

झूठ बदनाम इस क़दर हुआ कि दुनिया को ,

अब न क़ाबिल बचा हूँ मुँह तलक दिखाने के ;

मुझ सरेआम बेलिबास को चले-चलते ,

इक कफ़न जानेजाँ सियह लिहाफ़ कर देना ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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