तू क्या जाने क्या है मुझमें ?

सिंह है या चूहा है मुझमें !!

इत बसते हैं सीतापति उत ,

रावण भी रहता है मुझमें !!

बूढ़ा हूँ पर सच नटखट सा ,

अब भी इक बच्चा है मुझमें !!

मुझको हँसते कम ही पाना ,

इक चिर दुख बसता है मुझमें !!

मुँह खोलूँ तो उगलूँ लपटें ,

इक जंगल जलता है मुझमें !!

तू चाहे कुछ वैसा , कुछ-कुछ

मैं चाहूँ वैसा है मुझमें !!

तुझमें सब कुछ चुंबक जैसा ,

कुछ-कुछ लोहा सा है मुझमें !!

‘तू’ तज ‘आप’ कहें सब मुझको ,

इतना कुछ बदला है मुझमें !!

लगता हूँ मधु का कलसा पर ,

विष ही विष सिमटा है मुझमें !!

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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