मात बच्चों से ही खाकर रह गया हूँ ॥

तिलमिलाकर , छटपटाकर रह गया हूँ ॥

आर्ज़ू तो थी कि सोना ही उठाऊँ ,

हाथ मिट्टी ही उठाकर रह गया हूँ ॥

मो’तबर कोई नहीं जब मिल सका तो ,

राज़ सब दिल में दबाकर रह गया हूँ ॥

आँच कुछ माँगी है उसने तापने को ,

ख़ुद को बीड़ी सा जलाकर रह गया हूँ ॥

पूछते थे वो कि मैं क्या हूँ ? कहूँ क्या ?

आदमी हूँ ये बताकर रह गया हूँ ॥

उस हसीं की इक हँसी पर उम्र भर की ,

मैं कमाई को लुटाकर रह गया हूँ ॥

इस क़दर मुफ़्लिस हूँ मैं जाँ को बचाने ,

भूख में ख़ुद को चबाकर रह गया हूँ ॥

( आर्ज़ू = कामना , मो’तबर = विश्वसनीय , हसीं = सुंदर , मुफ़्लिस = ग़रीब )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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