हथेली पर ही सरसों को जमाने चल पड़ा हूँ मैं ॥

कि बिन पिघलाए पत्थर को बहाने चल पड़ा हूँ मैं ॥

नहीं हैं आँखें जिसकी और न जिसके कान भी उसको ,

गले को फाड़कर अपने बुलाने चल पड़ा हूँ मैं ॥

जड़ें अपनी जमाने में जहाँ पे नागफणियाँ भी

उखड़ जाएँ , वहाँ तुलसी उगाने चल पड़ा हूँ मैं ॥

कहाँ तक हुस्न से उसके बचाऊँ अपनी आँखों को ,

कि आख़िरकार उससे दिल लगाने चल पड़ा हूँ मैं ॥

जो सुलगा दे नदी को वो उसे ही अपना दिल देगी ,

यही सुनकर समंदर को जलाने चल पड़ा हूँ मैं ॥

हमेशा आँख में आँसू भरे वो घूमता रहता ,

उसे कर मस्ख़री थोड़ा हँसाने चल पड़ा हूँ मैं ॥

दमे आख़िर ज़माने से जो दिल में दफ़्न है इक राज़ ,

उसे इक राज़दाँ को अब बताने चल पड़ा हूँ मैं ॥

न रेगिस्तान में पीने को भी पानी मयस्सर था ,

हुई बरसात तो प्यासा नहाने चल पड़ा हूँ मैं ॥

बहुत फूलों को सिर ढोया , उठाए नाज़ हसीनों के ,

अब उकताकर पहाड़ों को उठाने चल पड़ा हूँ मैं ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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